मैं भी दौड़ सकता हूँ

सोमवार , २० जून २०२२, देहरादून।  पिछले दो दिन से शरीर बड़ा दर्द कर रहा है ,खासकर पैर , पीठ और गर्दन। चलते हुए , करवट बदलते हुए, उठते, बैठते, झुकते हुए एक आह निकल जाती है।  काम ही कुछ ऐसे किये थे, ये तो होना ही था.

नहीं !! नहीं !! किसी ने पीटा नहीं,  कहीं गिरा, ना चोट लगी  है।

बात शुक्रवार की है , मैं अपने अक्टूबर के मैराथन इवेंट के प्रमोशन पर कुछ सोच रहा था तभी एक ख्याल आया की मैराथन में हमेशा भागना तो जरूरी नहीं बीच बीच में चल भी सकते हैं , रुक भी सकते हैं। फिर सोचा कोई सिर्फ चलकर भी तो हाफ मैराथन पूरी कर सकता है , असली लक्ष्य तो फिनिशिंग लाइन को क्रॉस करना है।  एक बार पूरी हो जाए तो अगली बार एक बेहतर समय से ख़त्म कर सकते हैं , ये विश्वास तो रहेगा की मैं पूरी कर सकता हूँ।  

यही सोच कर विचार आया क्यों न कल सुबह कोशिश की जाए।  अपने कॉलेज एलुमनाई के कुछ दोस्तों को भी बोल दिया कि चलो सुबह २१ किलीमीटर रन करते हैं। अगली सुबह नींद ही थोड़ी देर से खुली, बाहर हल्की बारिश लगी हुई थी। मतलब कोई प्रोग्राम नहीं। दिन भर रिमझिम रुमझिम बूँदें लगी रही.  
 
शाम करीब चार साढ़े चार का वक्त था।  सुबह से रिमझिम रुमझिम बूँदें लगी हुई थी तो मैं घर पर ही बने अपने ऑफिस में एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था. अभी थोड़ी देर पहले बारिश रुकी थी, वातावरण में थोड़ा ठंडक हो गई थी दिन में फंखे की जरुरत भी महसूस नहीं हुई.  मौसम को देखते  हुए चाय समोसा खाने का मन हुआ,  कॉलेज एलुमनाई वाले दोस्तों से पुछा तो सब व्यस्त थे।   

फिर सोचा कि चलो हाफ मैराथन ही करके देखता हूँ।  मेन्टल ब्लॉक लगभग ख़त्म हो चूका था। शाम के पांच  बज गए थे और प्लान बन चुका था।

वैसे तो मै रनर नहीं हूँ पर पिछले एक साल में काफी रनिंग इवेंट्स करने के बाद रनर्स के बीच कुछ वक़्त जरूर बिताया है. मुझे साइकिलिंग में ज्यादा मज़ा आता है , रनिंग तो बस साल में एक-दो बार वो भी किसी इवेंट में अगर पांच किलोमीटर या दो किलोमीटर का विकल्प हो तो । हाफ मैराथन (२१ किलोमीटर) दौड़ना कभी मेरी सोच में भी नहीं था ,  मेरे लिए ये बहुत मुश्किल काम था तो कभी विचार भी नहीं आया।

आज विचार आया तो ऐसा की अभी चलते हैं , गूगल मैप पर एक दो रुट्स देखने के बाद अपने घर से राजपुर रोड होते हुए कैनाल रोड और वहां से हेलिपैड होते हुए पसिफ़िक गोल्फ एस्टेट और वहां से वापस पर रूट फाइनल किया.  कपडे बदले, जूते पहने और ठीक पांच  बजकर तीस मिनट  पर घर से निकल पड़ा अपनी पहली हाफ मैराथन दूरी पूरी करने.

थोड़ा आगे आया ही था की ध्यान आया कि  पानी की बोतल तो घर पर ही भूल गया, चलो कोई बात नहीं रास्ते में ले लूंगा.
घर से वाक करते हुए निकला, दिलाराम चौक से ऊपर (हम देहरादून वाले दिशा बताते समय ऊपर ,नीचे का ज्यादा प्रयोग करते हैं ) मतलब बायीं ओर  मुड़ गया , शनिवार शाम होने के कारण राजपुर रोड पर गाड़ियों की बहुत भीड़ थी , जिसकी वजह से सड़क पर चलने में भी बड़ी दिक्कत हो रही थी , किसी तरह मैं  तेज़ कदमो से चलता रहा , कैनाल रोड पहुंचा तो गाड़ियों की भीड़ कुछ काम हुई  लेकिंग यहाँ गाड़िया मेरे बिलकुल बगल से तेज़ रफ़्तार में निकल रही थीं।  मैं भी जितना तेज़ चल सकता था चलता रहा, बीच बीच में दौड़ भी लेता था पर ज्यादातर तेज़ गति से चलता रहा।  आसानी से पहले ५ किलोमीटर निकल गए , पानी की जरूरत महसूस नहीं हो रही थी लेकिन पसीना काफी आ रहा था।  थोड़ा आगे चलकर एक पानी की बोतल ली और अपना सफर जारी रखा।  कैनाल रोड के अंतिम छोर पर पहुँच कर देखा तो सात  किलोमीटर से ज्यादा हो चुके थे।  वहां पुल पर रुका एक सेल्फी ली, दो  घूँट पानी पिया और फिर चलने लगा , आगे चढाई थी, जिसे मुझे चलकर ही पूरा करना था मैं  किसी भी तरह से थकना नहीं चाहता था। चढाई पार की, हैलीपैड पार किया और जैसे ही सहस्त्रधारा रोड पर पहुंचा फिर से गाड़ियों की भीड़ ,अभी तक नौ किलोमीटर से ज्यादा हो गए थे , ट्रैफिक में चाल कुछ धीमे पड़  गई थी पर मैं चलता रहा , पसिफ़िक गोल्फ एस्टेट से पहले मैंने देखा की दस  किलोमीटर होने वाले हैं और २१  पूरे करने के लिए मुझे ५००  और करना पड़ेगा तो मै बायें और एक रोड पर मुड़ गया वहां ५०० मीटर आगे गया और वापस आया , अभी तक ग्यारह किलोमीटर चुके थे पसिफ़िक गोल्फ एस्टेट की तरफ जाने की जरूरत नहीं थी, फिर भी वहां  पर एक सेल्फी लेने के चक्कर में मैं वहां तक चला गया.

अब मेरी वापसी शुरू हो रही थी तो मैंने एक नमकीन का पैकेट लिया थोड़ी खाई  और बाकी सफर  के लिए जेब में रख दी।  अब मुझे ज्यादातर दौड़कर जाना  था लेकिन थकना नहीं था.  यही ध्यान में रखकर मैं दौड़ता और सांस फूलने पहले रुक जाता और तेज़ तेज़  चलने लगता।  अपने को हाइड्रेटेड रखने के लिए बीच बीच में एक घूँट पानी पीता रहता , ऐसे दौड़ते ,रुकते, चलते   पंद्रह  किलोमीटर आसानी से बिना किसी थकावट के हो गए, एक सब्जी की दूकान से एक  केला लेकर खाया और आगे बढ़ चला. मेरा उद्देश्य इस लक्ष्य को साढ़े तीन घंटे से पहले करने का था , जिसके लिए ये जरूरी था की मेरी सांसें न फूलें।

मुझे ये भी पता था की अब मुश्किलें बढ़ने वाली हैं , क्योंकि अब शरीर थकने  लगेगा। धीरे धीरे दौड़ते रुकते  उन्नीस  किलोमीटर हुए तो मैंने दूकान से एक chocolate ली, अब पैर थकने लगे थे और चलने से ज्यादा धीरे धीरे भागना ज्यादा सही लग रहा था , राजपुर रोड पर पहुंचा तो फिर से ट्रैफिक का सामना हुआ. पैरों जवाब दे रहे थे पर सांसें सामान्य (नार्मल ) थी और अब मेरा लक्ष्य भी पूरा होने वाला था।  रात सवा नौ बजे मैंने २१. १ किलोमीटर पूरे कर लिए थे , ये हाफ मैराथन दौड़ तो नहीं थी पर मैंने हाफ मैराथन डिस्टेंस चलकर और कुछ दौड़कर ३ घंटे २४ मिनट में पूरे जरूर कर लिए थे.    

अब घर तक के ४०० मीटर बहुत ज्यादा लग रहे थे पर एक ख़ुशी थी की हाँ मैं भी दौड़ सकता हूँ , मैं भी हाफ मैराथन पूरी कर सकता हूँ। एक बहुत बड़ा मेन्टल ब्लॉक ख़त्म हो गया था।

आज ३ दिन बाद भी पैरों और गर्दन का दर्द खत्म नहीं हुआ है।

अनिल मोहन